मंगलवार, 17 मई 2022

भक्ति

 भक्ति   BHAKTI 


 भक्ति शब्द मूल 'भज्‌' धातु से निकला हुआ है जिसका अर्थ है 'ईश्वर के प्रति अनुराग होना ।' ईश्र के प्रति परम प्रेम ही भक्ति है । यह प्रेम है प्रेम के लिए । भक्त एकमात्र ईश्वर को ही चाहता है । यहाँ स्वार्थपूर्ण आशा नहीँ । भक्ति अमृत-स्वरूपा है । ईश्वर के प्रति प्रेम का सहज प्रवाह ही भक्ति है । यह शुद्ध प्रेम है । उत्कृष्ट रस से युक्त शुद्ध उन्नत भाव ही भक्त को ईश्वर से मिलाता है । यह भक्तोँ के अनुभव की वस्तु है ।  


 भक्ति सभी प्रकार के धार्मिक जीवन का आधार है । भक्ति वासनाओँ तथा अहङ्कार को विनष्ट करती है । भक्ति मन को उच्चतम शिखर तक उन्नत करती है । ज्ञान के प्रकोष्ठोँ को खोलने के लिए भक्ति ही एकमात्र कुञ्जी है । भक्ति की परिसमाप्ति ज्ञान मेँ होती है । भक्ति दो से प्रारम्भ होती तथा एक मेँ समाप्त होती है । परा-भक्ति तथा ज्ञान एक ही हैँ ।


 प्रेम से बढ़ कर कोई सद्‌गुण नहीँ । प्रेम से बढ़ कर कोई सम्पत्ति नहीँ । प्रेम से बढ़ कर कोई धर्म नहीँ ; क्योँकि प्रेम सत्य है तथा प्रेम ईश्वर है । प्रेम तथा भक्ति पर्यायवाची शब्द हैँ । यह जगत्‌ प्रेम से उत्पन्न होता है, प्रेम मेँ ही स्थित है तथा अन्ततः यह प्रेम मेँ ही विलीन हो जाता है । ईश्वर प्रेमस्वरूप है । सृष्टि के हर कण मेँ आप उसके प्रेम को परख सकते हैँ । 


 प्रेम, श्रद्धा तथा भक्ति के बिना जीवन निस्सार है । यह वास्तव मेँ मृत्यु ही है । प्रेम दिव्य है । प्रेम जगत्‌ की सबसे बड़ी शक्ति है । यह अदम्य है । प्रेम ही वास्तव मेँ मनुष्य के हृदय को जीत सकता है । प्रेम शत्रु को पराजित करता है । प्रेम जङ्गली, भयानक, हिँस्र पशुओँ को पालतु बना सकता है । इसकी शक्ति असीम है । इसकी गहराई अथाह है । इसका स्वभाव अमिट है । इसकी महिमा अनिर्वचनीय है । धर्म का सार प्रेम है । अतः शुद्ध प्रेम को विकसित कीजिए ।


 क्या आप वास्तव मेँ ईश्वर को चाहते हैँ ? क्या आप वास्तव मेँ उसके दर्शन के लिए लालायिक हैँ ? क्या आपमेँ सच्ची आध्यात्मिक भूख है ? जो ईश्वर के दर्शन के लिए लालायित है, वही प्रेम का विकास कर सकता है । उसके लिए ही ईश्वर प्रकट होता है । ईश्वर तो माँग तथा माँग-पूर्ति का विषय है । यदि ईश्वर की सच्ची माँग है तो तुरन्त माँग-पूर्ति होगी ही ।


 नवधा भक्ति का शनैः-शनैः विकास किजिए । भगवान्‌ की लीला का श्रवण कीजिए___यह श्रवण है । उनकी स्तुति का गायन कीजिए ___यह कीर्त्तन है । उनके नामोँ का स्मरण कीजिए___यह स्मरण है । उनके चरण-कमलोँ की पूजा कीजिए___यह पाद-सेवन है । फूल चढ़ाइए___यह अर्चन है । साष्टाङ्ग नमस्कार कीजिए___यह वन्दन है । उनकी सेवा कीजिए___यह दास्य-भाव है । उनसे मित्रता स्थापित कीजिए___यह सख्य-भाव है । उनके प्रति पूर्ण अशेष आत्मार्पण कीजिए___यही आत्मनिवेदन है ।


 ईश्वर से अपनी सहायत के लिए प्रार्थना करते हुए आलसी बन कर बैठे न रहिए । उठिए, काम मेँ लग जाइए ; क्योँकि ईश्वर उन्हीँ की सहायता करते हैँ जो अपनी सहायता स्वयं करते हैँ । यथाशक्ति प्रयास कीजिए और शेष ईश्वर पर छोड़ दीजिए । भक्तोँ की सेवा कीजिए । उनकी सङ्गति मेँ रहिए । जप तथा कीर्त्तन कीजिए । रामायण तथा भागवत का स्वाध्याय कीजिए । वृन्दावन अथवा अयोध्या मेँ कुछ काल निवास कीजिए । इससे आप शीघ्र ही भक्ति का विकास करेँगे । 


 प्रह्लाद के समान हार्दिक प्रार्थना कीजिए । राधा के समान भजन कीजिए । वाल्मीकि, तुकाराम तथा तुलसी के समान उनके नाम का जप कीजिए । गौराङ्ग के समान कीर्त्तन कीजिए । ईश्वर के विरह मेँ मीरा के समान एकन्त मेँ रुदन कीजिए । आप इसी क्षण भगवान्‌ के दर्शन प्राप्त करेँगे ।

 

 अपने हृदय मेँ ईश्वर की ज्योति जलाइए । सवसे प्रेम कीजिए । विश्व-प्रेम का विकास कीजिए । प्रेम रहस्यमय ईश्वरीय श्लोष है, जो सभी हृदयोँ को बाँध देता है । यह महान्‌ शक्तिशाली ईश्वरीय चमत्कारिक औषधि है । प्रत्येक कार्य को शुद्ध प्रेम से परिपूरित कीजिए । धूर्त्तता, लोभ, सङ्कीर्णता तथा स्वार्थ को विनष्ट कर डालिए । उदार कर्मोँ को सतत करते रहने से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है । घृणा, क्रोध तथा ईर्ष्या को प्रेमपूर्वक सतत सेवा के द्वार दूर किया जाता है । उदार कर्मोँ के करने से आप अधिक वल, अधिक आनन्द तथा अधिक तृप्ति प्राप्त करेँगे । करुणा, उदारता तथा सदय सेवा के अभ्यास से हृदय शुद्ध तथा कोमल वनत है, हृदय का पद्म ऊपर की ओर खिल उठता है तथा साधक ईश्वरीय ज्योति के ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है ।


 शास्त्र अनन्त हैँ । जानने को बहुत-कुछ है । समय अल्प है । बाधाएँ बहुत हैँ । जिस तरह हंस जल तथा दूध के मिश्रण से दूध को ही ग्रहण करता है, उसी भाँति आपको सारतत्त्व ही ग्रहण करना चाहिए । वह सारवस्तु प्रेम अथवा भक्ति है । इस सारवस्तु का पान कीजिए तथा शान्ति एवं अमृतत्व के शाश्वत धाम को प्राप्त कीजिए । 


 प्रेम मेँ निवास कीजिए । प्रेम मेँ श्वास लीजिए । प्रेम मेँ खाइए । प्रेम मेँ पीजिए । प्रेम मेँ टहलिए । प्रेम मेँ बोलिए । प्रेम मेँ प्रार्थना कीजिए । प्रेम मेँ गाइए । प्रेम मेँ ध्यान कीजिए । प्रेम मेँ विचार कीजिए । प्रेम मेँ घूमिए । प्रेम मेँ लिखिए । प्रेम मेँ ही प्राण-त्याग कीजिए । ईश्वरीय प्रेम-मधु का आस्वादन कीजिए । तथा प्रेम-विग्रह या प्रेम-मूर्त्ति बन जाइए ।


 आप सबमेँ भक्ति की ज्वाला अधिकाधिक प्रखर बने ! आपका हृदय भक्ति से परिप्लावित बने ! आप सभी प्रबुद्ध स्थिति मेँ प्रेम-सागर मेँ निमज्जित होँ ! आप सबको भागवतोँ के आशीर्वाद प्राप्त होँ ! आप सबको शान्ति मिले ! 



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