मंगलवार, 17 मई 2022

मन का नियन्त्रण

 मन का नियन्त्रण 


 इस भौतिक जगत्‌ का जीवन शाश्वत सुख और आनन्द के नित्य जीवन के लिए तैयारी मात्र है । मन को शुद्ध बना कर गम्भीर सतत ध्यान के द्वारा आत्मज्ञान की प्राप्ति से ही यह प्राप्त किया जा सकता है । परमानन्द के इस अमर जीवन को बाइबिल मेँ श्वर्ग का साम्राज्य बतलाया गया है जो कि आपके भीतर है, आपके हृदय मेँ है । हे सुशील ! मन को वशीभूत कर इस अमर जीवन का साक्षात्कार कीजिए और आत्मा के परमानन्द का उपयोग कीजिए । 


 योगशास्त्र के रहस्य को उसी साधक के प्रति प्रकट किया जा सकता है, जो जितेन्द्रिय तथा अभ्यास-शूर है, जिसमेँ गुरुभक्ति, वैराग्य तथा विवेक है, जिसका सङ्कल्प अडिग है तथा जिसमेँ ईश्वर के अस्तित्व के प्रति सुदृढ़ विश्वास है । 


 मन एक ही है; परन्तु स्वप्नावस्था मेँ वह मायाशक्ति के द्वारा द्रष्टा और दृश्य का रूप धारण करता है । मन ही गुलाब, पर्वत, हाथी, सरिता, सागर, शत्रु आदि के रूप को धारण करता है । जिस से अपृतक्करणीय है । इससे मन अशान्त रहता है । वृत्ति रजस्‌ की शक्ति से होती है । वृत्ति ही मन की अशान्ति का कारण है । भक्त इस विक्षेप को जप, उपासना तथा इष्टदेवता की पूजा द्वारा दूर करते हैँ । 


 मन वृत्ति की शक्ति ही है । यह तरङ्गित मन ही जगत्‌ है । तरङ्गोँ के न रहने पर मन मन नहीँ रहता । तरङ्गोँ के अभाव मेँ मन का अस्तित्व नहीँ रहता । मन की इस तरङ्ग-शक्ति को ही माया कहते हैँ । तरङ्ग-शक्ति द्वारा ही मन ऊधम मचाता है । तरङ्ग ही मार या शेतान या वासना या एषणा या तृष्णा है । इस तरङ्ग ने ही विश्वामित्र को प्रलोभित किया था । यह तरङ्ग ही प्रयत्नशील साधक को गिरा डालती है । प्रवल विवेक, सतत ध्यान तथा अनवरत ब्रह्म-विचार के द्वारा इस तरङ्ग को नष्ट कर डालिए । 


 तरङ्ग के प्रकट हो विभिन्न प्रकार के विकल्प उत्पन्न हो जाते हैँ । तरङ्ग तथा विकल्प दोनोँ का यह अस्तित्व है । विकल्प तरङ्ग के समान ही भयङ्कर है । तरङ्ग मन को गतिशील करती है । कल्पना मन को स्थूल बनाती है । तरङ्ग तथा कल्पना से रहित मन शून्य ही है । तरङ्ग तथा कल्पना मनरूपी पक्षी के दो डैने हैँ । आत्मविचार द्वारा दाहिने डैने को तथा निर्विचार के अभ्यास द्वारा बायेँ डैने को काट डालिए । यह महान्‌__मन तत्क्षण मर कर गिर जायेगा । 

 

 मन ही आत्मा तथा शरीर के बीच विभाजक दीवार है । यदि अनवरत विचार के द्वारा इस दीवार को तोड़ देँ तो जीव परमात्मा मेँ उसी तरह मिल जाता है जिस तरह नदी समुद्र मेँ मिल जाती है । 


 अपनी आखेँ बन्द कर लीजिए । ध्यान कीजिए । अदृश्य शक्ति के अन्तर्प्रवाह के लिए हृदय को खोल दीजिए । इञ्जील मेँ उल्लेख है, 'स्वयं को खाली कर ; मैँ तुझे भर दूँगा ।" तब आपको प्रचुर परम अतीन्द्रिय ज्ञान प्राप्त होगा जो बुद्धि की पहुँच से परे है । जिस तरह नल खोल देने से पानी अबाध गति से बहने लगता है, उसी तरह ज्ञान-मार्ग मेँ आने वाले अज्ञान के प्रतिबन्धोँ के निवारण करते ही दिव्य ज्ञान प्रवाहित होने लगता है । आप दिव्य प्रेरणा, उद्‌धाटन तथा अतीन्द्रिय ज्ञान की झलक तथा दमक पायेँगे । सारे उफनते विचारोँ तथा भावनाओँ को शान्त कर मन को विषय-पदार्थोँ से हटा कर शान्त अवस्था मेँ उसे आत्मा से उसी प्रकार सम्बद्ध करना होगा जिस प्रकार आप दूरभाष (Mobile phone) मेँ डायल (Dial) कर उन दो व्यक्तियोँ को, जो आपस मेँ बातचित करना चाहते हैँ, सम्बन्धित करते हैँ ।


 सारे द्वैत मन के हैँ । सारा द्वेत मन की कल्पना से उत्पन्न है । यदि विवेक, वैराग्य, शम, दम तथा समाधान के सतत अभ्यास से आप सारी कल्पनाओँ को अपने मन मेँ समेट लेँ, तब आपको इस द्वन्द्वात्मक जगत्‌ का अनुभव नहीँ होगा मन अमन हो जायेगा । विषय-वस्तु के अभाव मेँ वह अपने मूलस्रोत आत्मा मेँ स्थित हो जायेगा । 


 'मेरा मन दूसरी जगह था, मैँने देखा नहीँ', 'मेरा मन दूसरी जगह था, मैँने सुना नहीँ'__ऐसा इसलिए कहते हैँ क्योँकी मनुष्य अपने मन से ही देखता है तथा अपने मन से ही सुनता है । 


 विषयोँ के आकर्षण तथा विभिन्न प्रकार के बन्धनोँ से मनुष्य इस संसार मेँ बँध जाता है । सारे विषयोँ के प्रति रागोँ का त्याग तथा सारे बन्धनोँ का तोड़ना ही सच्चा संन्यास है । जो संन्यासी अथवा योगी राग तथा बन्धनोँ से मुक्त है, वह असीम शान्ति, परम सुख तथा शाश्वत आनन्द का अनुभव करता है । 


 मन को ॐ (प्रणव) मेँ विलीन कर देना चाहिए । जिस योगी अथवा ज्ञानी का मन ॐ मेँ विलीन है, उसके लिए भय नहीँ ; वह जीवन के लक्ष्य को पा चुका है । 


 ध्यान की अग्नि सारे दोषोँ तथा पापोँ को शीघ्र ही जला डालती है, तब उस सत्य का ज्ञान होता है जो पूर्णता, नित्य शान्ति तथा अमृतत्वप्रदायक है । 


 सतत स्थिर अभ्यास के द्वारा वृत्तियोँ को रोकिए । मन अमन हो जायेगा । आप योगारूढ़-अवस्था प्राप्त करेँगे । समाधि मेँ मन सत्य मेँ स्थित होता है तब अविद्या के बीज, जो चित्त मेँ संस्कार-रूप से गड़े हुए हैँ, विदग्ध हो जाते हैँ । यह अविद्या के बीज को जलाने वाली अग्नि ज्ञान-अग्नि अथवा योग-अग्नि है ।


 जब योगी ध्यान की अन्तिम अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जब वह असम्प्रज्ञात-समाधि मेँ प्रवेश करता है तो इसी जन्म मेँ जीवन्मुक्त हो जाता है । योगिक समाधि की अग्नि सभी संस्कारोँ को पूर्णतः जला डालती है । तब पुनर्जन्म के बीज नहीँ रह जाते । 



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