मंगलवार, 17 मई 2022

कर्मयोगी की प्रर्थना

 कर्मयोगी की प्रर्थना 


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इस श्लोक को ध्यान के अन्त मेँ कहिए :


आत्मा त्वं गीरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं,

 

पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।


सञ्चारा पदयोः प्रदक्षिण विधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरा,


यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्‌  ॥ 


तु मेरी आत्मा है । बुद्धि तेरी पत्नी पार्वती है । प्राण तेरे सहचर हैँ । यह शरीर तेरा घर है । विषयोपभोग तेरी पूजा है । सुषुप्ति समाधि है । पैरोँ से मेरा चलना ही तेरी प्रदक्षिणा है । मेरी सारी वाणी तेरी स्तुति ही है । जो भी कर्म मैँ करता हूँ ; हे शम्भो ! वह सब तेरी आराधना ही है ।



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