एकश्लोकि रामायणम् ३
जन्मादौ क्रतुरक्षणं मुनिपतेः स्थाणोर्धनुर्भञ्जनं
वैदेहीग्रहणं पितुश्च वचनाद्घोराटवीगाहनम् ।
कोदण्डग्रहणं खरादिमथनं मायामृगच्छेदनं
बद्धाब्धिक्रमणं दशास्यनिधनं चैतद्धि रामायणम् ॥
इति एकश्लोकि रामायणं (३) सम्पूर्णम् ॥
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