बुधवार, 7 जनवरी 2026

मौसम बदले तो आदतें भी बदलें, जानिए छह ऋतुओं के अनुसार आहार-विहार

 मौसम बदले तो आदतें भी बदलें, जानिए छह ऋतुओं के अनुसार आहार-विहार



जनवरी-फरवरी


शिशिर ऋतु


शि फिर ऋतु वर्ष की सबसे ठंही ऋतु मानी जाती है। इस समय समय ठंड के कारण शनीर की ऊष्मा भीतर सिमट जाती है, जिससे पाचन अग्नि प्रबल होती है। इस काल में भूखा रहना और रूखा-सूखा भोजन हानिकारक है। पर्याप्त माजा में भोजन रूपी इंधन न मिलने से शरीर में वात दोष बढ़ जाता है। इसलिए सही आहार-विहार की आदतों को अपनाना जरूरी है।


दोष स्थितिः कफ दोष का संचय, शीत और अक्षता के कारण वात प्रभाव बना रहता है।


आहारः शीत ऋतु में चिकनाई, मधुर, लवण और अन्स रस युक्त पोषक कच्चों वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए, जैसे धी. दूध, नया अनाज, तिल, गुड़, उड़द, आआंवला-सेब का मुरब्बा, मेवों से बने पदार्थ, अंकुरित चना, मूंग, गेहूं एवं चना की रोटी, वर्षभर पुराने चावल, मेथी, सौंठ, हरी सब्जियां, गर्म जल, गर्म पदार्थ आदि का सेवन करें।


विहारः व्यायाम और योगासन करें। तेल मालिश, उबटन एवं सिर पर तेल मालिश करना उपयोगी है। सरसों के तेल में कर्पूर डालकर मालिश करने से जोड़ों का दर्द और गठिया आदि में आराम मिलता है। गर्म कपड़े पहनें, गर्म पानी पीएं, धूप लेना लाभकारी है।


रखें ध्यान: देर रात तक जागना, व्यायाम न करना, कटु, तिक्त और कथाय रस वाले पदार्थ, खलाई, ब‌ट्टा वही, आम का अचार आदि का सेवन काम से कम करें।


उपाय। अदरक, पिप्पली, हरीतकी, तुलसी, लहसुन फायदेमंद है। हरड़ के साथ आधा चम्मच पिप्पली का चूर्ण ताजा पानी के साथ लें।


मार्च-अप्रैल


क्सत ऋतु


संत ऋतु सब ऋतुओं से सुहानी होती है। यह ऋतु व शीतकाल और ग्रीष्म काल कार साधि समय होता है। इस ऋतु में सूर्य की किरणें तेज होने लगती हैं। शीत काल में सरीर के अंदर जो कफ जमा ही जाता है. यह इन किरणों की गर्मी से पिघलने लगता है। इससे शरीर के कफ दोष बढ़ने से खांसी, जुकाम, नजला, दमा, मले की खराश, माथनशक्ति की कमी आदि समस्या होने लगती हैं।


दोष स्थितिः कफ का प्रकोप बढ़ जाता है।


आहारः इस ऋतु में कटु रस युक्त तीक्ष्ण और कमाय पदार्थों का सेवन लाभकारी है। मूंग, चना और जी की रोटी, पुराना गेहूं था चावल, अंकुरित चन्ना, मक्खन लगी रोटी, हरी शाक सब्जी और उनका सूप, सरसों का तेल, सब्जियों में करेला, लहसुन, पालक, जिमीकंद एवं कच्ची मूली, नीम की नई कॉपरों, सौंठ पीपल, कालीमिर्च, त्रिफला, नींबू, मौसमी और शहद का प्रयोग बहुत लाभकारी है।


विहारः सूर्योदय से पहले भ्रमण करने से स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। नियमित रूप से हल्का व्यायाम और गोगासन करें। तेल की मालिश करें, उबटन लगाकर गुनगुने पानी से स्नान करें।


रखखें ध्यानः जल अधिक मात्रा में पीना चाहिए। भारी, चिकनाई युक्त, ख‌टे व मीठे एवं शीत प्रकृति वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना याहिए। नया अनाज उड़द, रबडी, मलाई जैसे भारी भोज्य पदार्थ एवं खजूर का सेवन करना भी ठीक नहीं होता है।


उपाय: नीम, हल्वी, धनिया, जीरा और सौंफ साभकारी है। हरड़ के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करना फायदेमंद है।


मई जून


ग्रीष्म ऋतु


पमान एकदम बढ़ जाता है। शरीर ग्री ऋतु में पृथ्वी का तापमान में पसीना अधिक मात्रा में आता है। प्यास अधिक लगती है। जीवाणुओं का संक्रमण शीघ्र होता है और कमन (उल्टी), अतिसार (दस्त), पेधिश आवि


समस्याएं बढ़ जाती हैं। दोष स्थितिः इस ऋतु में शरीर में पित्त संचय एवं वात प्रभाव बढ़ जाता है।


आहारः ग्रीष्म ऋतु में हल्का, चिकना, मधुर रस युक्त, सुप्तध्य, शीतल और तरल पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए। चीनी, पी, दूध, दही का सेवन करना चाहिए। पुराने जी, मौसमी फल-सब्जियां, सूखे मेदों में किशमिश, मुनक्का, अंजीर, बादाम भीगे हुए खाना फायदेमंद है। तरल पदार्थ में आम का पना, बेल का शर्बत लाभकारी हैं।


ह मारे शरीर पर खानयान के अलावा ऋतुओं का भी प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार एक ऋतु में कोई एक दोष बढ़ता है, तो कोई शांत होता है। है और दूसरी ऋतु में कोई दूसरा दोष बढ़ता तथा अन्य शांत होता है। एक वर्ष को छह ऋतुओं में बांटा गया है। इस तरह हमारे शरीर पर ऋतुओं का विशेष प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद में प्रत्येक ऋतु में दोषों में होने वाली वृद्धि, प्रकोप या शांति के अनुसार अलग अलग प्रकार के खानपान और रहन सहन का उल्लेख किया गया है। इस संबंध में लोकोक्ति है कि श्रावण मास में दूध, भाद्रपव में छाछ, क्वॉर मास में करेला और कार्तिक मास में वही का सेवन नहीं करना चाहिए। तो आइए आयुर्वेदिक हैल्थ कैलेंडर से जानते हैं कि अलग-अलग ऋतु के अनुसार हमारा आहार-बिहार कैसा हो, ताकि यह साल स्वास्थ्यवर्धक बना रहे...


इस साल अपनाइए...


आयुर्वेदिक कैलेंडर


पत्रिका एक्सपर्ट पैनल


डॉ. सविता सिंह बिरमन आयुर्वेद विशेषता नई


श्रद्धा मराठे आहार विशोषधया नई दिल्ली


विहारः सुबह के समय बाग-बगीचों में भ्रमण करना लाभकारी है। सूती एवं सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। बाहर धूप में नहीं घूमना चाहिए। घर से निकलते समय एक गिलास उण्डा पानी अवश्य पीना चाहिए। एक साबुत प्याज साथ में रखें, इससे लू नहीं लगेगी। ठंडी जगह पर रहें।


सहखें ध्यान। इस ऋतु में भोजन कम मात्रा में और खूब चबा-चबा कर खाना बहुत जरूरी है। भोजन ताजा और गर्म लेना चाहिए। रात का भोजन विशेष रूप से हल्का और चुपाच्य होना चाहिए। यदि हो सके तो इस समय सप्ताह में एक-दो बार खिचड़ी खाएं। रात का भोजन जितना जल्दी हो सके कर लेना चाहिए। इस ऋतु में दिन के समय बौड़ा सोया जा सकता है। उपायः चंदन, पुदीना, घनिया और गुलाब का प्रयोग लानकारी है। हरड़ का सेवन समान मात्रा में गुड़ मिलाकर करना चाहिए। चंदना दर्शन करना भी सेहतमंद माना गया है।


डॉ. ओम प्रकाश दाधीच आयुर्वेद विरोध्या, जयपुर


डॉ. मृत्युंजय एम. माली आयुर्वेद विशेषज्ञ, पोचल patrika.com


नवंबर-दिसंबर


हेमंत ऋतु


हे मंत ऋतु दंडी ऋतु मानी जाती है। इस समय ठंड के कारण शरीर की ऊष्मा भीतर सिमट जाती है. है जिससे पांचन अग्नि प्रबल होती है। इस ऋतु में दिन छोटे और रातें लंबी होने के कारण शरीर को आराम करने के साथ-साथ भोजन के पाचन के लिए भी अधिक अनुकूलता मिलती है। ऐसे में। आहार-विहार का नियम अवश्य अपनाएं।


दोष स्थितिः कफ संचय एवं जठराग्नि की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है।


आहारः हेमंत ऋतु में चिकनाई, मधुर, लवण और अप्ल रस युक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए, जैसे धी, दूध, नया अनाज, तिल, गुड़, उड़द, आंबला-सेब का मुरब्बा, मेवे, हरी सब्जियां, रात में दूध पीना लाभकारी है।


जुलाई-अगस्त


वर्षा ऋतु


व पां ऋतु में वातावरण में नगी का प्रभाव शरीर पर भी पहता है। ग्रीष्म ऋतु में पाचन शक्ति पहले से ही दुर्बल होती है। वर्षा ऋतु की नमी से यात दोष कुपित हो जाता है और पाचन शक्ति अधिक दुर्बल हो जाती है। संक्रमण से मलेरिचा और बुखार, जुकाम, बस्त, पेचिश, हैजा, नहिया जोड़ों में सूजन उच्च रक्तचाप फुंसियां वाव-खुजली आधि समस्याएं होने लगती हैं)


बोष स्थितिः वात का प्रकोप बढ़ जाता है एवं जठाग्नि


मंद हो जाती है।


आहारः वर्षा ऋतु में हल्के, सुपाच्य, ताजा, गर्म और पाचक अग्नि को बढ़ाने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन हितकारक है। अम्ल, लवण युक्त, पुराना अनाज, गेहूं, जौ, शालि और साठी चावल, मक्का (मुट्टा), खीर, मूग, पुदीना, मौसमी फल. घी-तैल से बाने नमकीन पदार्थ, शहद, सूप, अदरक युक्त भोजन विशेष रूप से लाभकारी हैं।


विहारः शरीर पर उबटन मलना, मालिश और सिकाई करना लाभदायक है। दिन में सोना नहीं चाहिए। हल्का शारीरिक व्यायाम ही करें। धूप में घूमना और सोना, अधिक पैवल चलना या अधिक शारीरिक व्यायाम भी सानिध्रव है। पंचकर्म (बस्ति) लाभकारी है।


रखें ध्यानः इस अतु में जल की शुद्धि का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मारी भोजन, बार-बार भोजन करना और भूख न होने पर भी भोजन करने से बचना चाहिए। गीले. नमीयुक्त कपड़ों का प्रयोग न करें।


उपाय: अदरक, सोठ, पिम्पली, तुलसी लाभकारी है। रसायन के रूप में हरड़


का चूर्ण सेंधा नमक मिलाकर लेना चाहिए।


सितंबर-अक्टूबर


शरद ऋतु


वबां ऋतु से शरीर को वहां और उसकी शीतलता सहन करने का अभ्यास हो जाता है। वर्षा के बाथ शारद ऋतु में सूर्य अपने पूरे तेज तथा गर्मी के साथ चमकता है। इस उष्णता के कारण वर्षा ऋतु के के दौरान शरीर में जमा हुआ पित्त दोष एकदम कुपित हो जाता हैं। इससे रक्त दुषित हो जाता है। इसके कारण बुखार, फोड़े-फुंसियां, त्वचा पर


चकते. खुजली आदि विकार उत्पफर होते हैं।


दोष स्थितिः पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है। बात दोष


का शमन होता है।


आहारः पित्त को शांत करने के लिए घी या तिक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इस ऋतु में मीठे, हल्के सुगाच्य, शीतल और तिक्त रस वाले खाय और पेय पदार्थ विशेष रूप से उपयोगी है। शालि चावल, मूग, गेहूं, जौ, उबाला हुआ दूध, दही, मक्यान, घी, मलाई, श्रीखंड, सब्जियों में श्रीलाई, बथुआ, लौक, तोई फूलगोभी, मूली, पालक, सोगा और सेम, फलों में अनार, आंवला, सिधाड़ा, मुनक्का, कमलग‌ट्टा लाभकारी हैं।


विहारः रात्रि के समय चंद्रमा की किरणों में बैठने, घूमने या सोने से स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। चंदन उबटन लगाना फायदेमंद है। इस ऋतु में जल को दिन के समय सूर्य की किरणों में तथा रात्रि में चंदमा की किरणों में रखकर प्रयोग लाना चाहिए।


रखें ध्यानः सरखें का तेल गट्टा, सौंफ, लहसुन, बैंगन, करेला, हींग, कालीमिर्थ पीपल, उड़द से बने भारी खाद्य पदार्थ, खट्टे पदार्थ न खाएं।


उपाय: नीम, गिलोय, आंवला, हल्दी का सेवन लाभकारी है। हरड़ के चूर्ण का सेवन शहद, मिश्री या गुड़ मिलाकर करना चाहिए।


विहारः इस ऋतु में व्यायाम का विशेष रूप से लाभ मिलता है। इससे शरीर बलवान और सुडौल बनता है। सरसों के तेल की मालिश से ताथा सुंदर और निरोग बनती है। अपनी शक्ति के अनुसार तेज याल से चलना उचित है।


रखें ध्यानः ती हवा से बचकर रहना चाहिए। ताप वाले स्थान पर रहना और सोना चाहिए। अग्नि और धूप सेंकना लाभकारी है। धूप पीठ की ओर से एवं अग्नि सामने से संकना चाहिए। कमरे "का तापमान गर्म रखें। इस काल में भूखा रहना और रूखा-सूखा भोजन खाना हानिकारक है। इससे शरीर का बात दोष बढ़ जाता है।


उपायः अश्वगंधा, शतावरी, पिप्पली, अदरक का सेवन लाभकारी है। रसायन में आधा चम्मच हरड़ एवं सम मात्रा में सौंठ चूर्ण का सेवन करना लाभकारी होता है।


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