କୁଲରରେ ପାଣି ମିଶାଇଲେ ଥଣ୍ଡା ପବନ କାହିଁକି ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ ?
ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଋତୁରେ, ଯେତେବେଳେ ଆମେ କୁଲରକୁ ଚାଲୁ କରି ପାଣି ମିଶାଇଥାଉ, ଅଳ୍ପ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ କୁଲରରୁ ଥଣ୍ଡା ପବନ ପ୍ରବାହିତ ହେବା ଆରମ୍ଭ କରେ। ଅନେକ ଲୋକ ଭାବନ୍ତି ଯେ କେବଳ ପାଣି ମିଶାଇ ବାୟୁ କିପରି ଥଣ୍ଡା ହୁଏ? କଲର ଭିତରେ କ’ଣ ଏୟାର କଣ୍ଡିସନର ପରି ଗ୍ୟାସ ଅଛି କି? ନା ପାଣି ନିଜେ ବାୟୁକୁ ଥଣ୍ଡା କରେ?
ଉତ୍ତର ବହୁତ ସରଳ। କୁଲର ଜଳ ବାଷ୍ପୀଭବନ ନୀତି ଉପରେ କାମ କରେ।
କୁଲରର ମୁଖ୍ୟ ନୀତି: ବାଷ୍ପୀଭବନ
ଯେତେବେଳେ ପାଣି ତାପ ଶୋଷଣ କରି ବାଷ୍ପରେ ପରିଣତ ହୁଏ, ତାହାକୁ ବାଷ୍ପୀଭବନ କୁହାଯାଏ।
ସରଳ ଭାଷାରେ, ଯେତେବେଳେ ପାଣି ବାୟୁ ସଂସ୍ପର୍ଶରେ ଆସେ, ଏହାର କିଛି ଅଂଶ ଧୀରେ ଧୀରେ ବାଷ୍ପୀଭବନ ହୁଏ। ବାଷ୍ପ ହେବା ପାଇଁ, ପାଣିକୁ ଶକ୍ତି ଆବଶ୍ୟକ ହୁଏ, ଅର୍ଥାତ୍, ତାପ। ଏହା ଆଖପାଖର ବାୟୁରୁ ଏହି ତାପ ଟାଣେ।
ଯେତେବେଳେ ପାଣି ବାୟୁରୁ ତାପ ଶୋଷଣ କରେ, ବାୟୁର ତାପମାତ୍ରା ହ୍ରାସ ପାଏ। ଏହି କାରଣରୁ କୁଲରରୁ ଆସୁଥିବା ବାୟୁ ଥଣ୍ଡା ଅନୁଭବ ହୁଏ।
କୁଲର ଭିତରେ କ’ଣ ହୁଏ?
ଏକ କୁଲର ଭିତରେ କିଛି ମୁଖ୍ୟ ଉପାଦାନ ଅଛି:
୧. ପାଣି ଟାଙ୍କି
୨. ପମ୍ପ
୩. ଘାସ କିମ୍ବା ମହୁଫେଣା ପ୍ୟାଡ୍
୪. ଫ୍ୟାନ୍ କିମ୍ବା ବ୍ଲୋଅର୍
୫. ଏୟାର ଇନଟେକ୍ ଏବଂ ଏକ୍ସହାଷ୍ଟ ଚ୍ୟାନେଲ୍
ଯେତେବେଳେ ଆମେ କୁଲରକୁ ପାଣିରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ କରୁ, ଏହା ତଳ ଟାଙ୍କିରେ ଜମା ହୁଏ। କୁଲରର ପମ୍ପ ଏହି ପାଣିକୁ ଉପର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପମ୍ପ କରେ ଏବଂ ଘାସ ପ୍ୟାଡ୍ କିମ୍ବା ମହୁଫେଣା ପ୍ୟାଡ୍ ଉପରେ ବିସ୍ତାର କରେ।
ଏହି ପ୍ୟାଡ୍ଗୁଡ଼ିକ ଓଦା ହୋଇଯାଏ। ଯେତେବେଳେ ବାହାରର ଉଷ୍ମ ବାୟୁ ଏହି ଓଦା ପ୍ୟାଡ୍ ଉପରେ ଯାଏ, କିଛି ପାଣି ବାଷ୍ପୀଭୂତ ହୁଏ। ଏହି ପ୍ରକ୍ରିୟାରେ, ପାଣି ବାୟୁରୁ ଉତ୍ତାପ ଶୋଷିତ କରେ। ଫଳସ୍ୱରୂପ, ଉଷ୍ମ ବାୟୁ ଥଣ୍ଡା ହୁଏ ଏବଂ ଫ୍ୟାନ୍ ଦ୍ୱାରା କୋଠରୀକୁ ଟାଣି ନିଆଯାଏ।
ଉଦାହରଣ:
ଧରନ୍ତୁ ଆପଣ ଆପଣଙ୍କ ହାତରେ କିଛି ପାଣି ଲଗାନ୍ତୁ। କିଛି ସମୟ ପରେ, ଯେତେବେଳେ ପବନ ବହିବ, ଆପଣଙ୍କ ହାତ ଥଣ୍ଡା ଅନୁଭବ ହୁଏ।
କାହିଁକି?
କାରଣ ଆପଣଙ୍କ ହାତରେ ଥିବା ପାଣି ବାଷ୍ପୀଭୂତ ହୁଏ। ଏହା ଆପଣଙ୍କ ହାତରୁ ଉତ୍ତାପ ଶୋଷିତ କରି ବାଷ୍ପ ସୃଷ୍ଟି କରେ। ସେଥିପାଇଁ ଆପଣଙ୍କ ହାତ ଥଣ୍ଡା ଅନୁଭବ ହୁଏ।
କୁଲରରେ ମଧ୍ୟ ସମାନ ଘଟଣା ଘଟେ। କେବଳ ପାର୍ଥକ୍ୟ ହେଉଛି କୁଲରଗୁଡ଼ିକ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକୁ ବଡ଼ ସ୍ତରରେ କରନ୍ତି।
କୁଲରରେ ଘାସ କିମ୍ବା ମହୁକମ୍ବ ପ୍ୟାଡର କାର୍ଯ୍ୟ
କୁଲର ପ୍ୟାଡର କାର୍ଯ୍ୟ କେବଳ ପାଣିକୁ ଧରି ରଖିବା ନୁହେଁ, ବରଂ ଏହାକୁ ଏକ ବୃହତ ପୃଷ୍ଠ ଅଞ୍ଚଳରେ ବିସ୍ତାର କରିବା।
ଯେତେବେଳେ ପାଣି ଏକ ବୃହତ ପୃଷ୍ଠ ଅଞ୍ଚଳରେ ବିସ୍ତାର କରାଯାଏ, ବାୟୁ ଏହା ସହିତ ଅଧିକ ସଂସ୍ପର୍ଶରେ ଆସେ। ଏହା ଅଧିକ ବାଷ୍ପୀଭବନକୁ ନେଇଥାଏ, ଯାହା ଫଳରେ ଥଣ୍ଡା ବାୟୁ ସୃଷ୍ଟି ହୁଏ।
ପୁରୁଣା କୁଲରଗୁଡ଼ିକ ଘାସ ପ୍ୟାଡ ବ୍ୟବହାର କରୁଥିଲେ। ଆଜିକାଲି, ଅନେକ କୁଲର ମହୁକମ୍ବ ପ୍ୟାଡ ବ୍ୟବହାର କରନ୍ତି। ମହୁକମ୍ବ ପ୍ୟାଡ ପାଣିକୁ ଅଧିକ ସମୟ ଧରି ରଖେ ଏବଂ ବାୟୁକୁ ଭଲ ଭାବରେ ଯିବାକୁ ଦିଏ, ଯାହା ସେମାନଙ୍କୁ ଅଧିକ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ କରିଥାଏ।
ଫ୍ୟାନର କାର୍ଯ୍ୟ କ'ଣ?
କୁଲରରେ ଥିବା ଫ୍ୟାନ ଗରମ ବାହାର ପବନକୁ ଟାଣି ଏକ ଓଦା ପ୍ୟାଡ ଉପରେ ଦେଇଥାଏ।
ଓଦା ପ୍ୟାଡ ଉପରେ ବାୟୁ ଯିବା ସହିତ, ପାଣି ବାଷ୍ପୀଭବନ ହୋଇଯାଏ, ବାୟୁରେ ଉତ୍ତାପ ହ୍ରାସ କରେ। ଏହି ଥଣ୍ଡା ବାୟୁ ତାପରେ କୋଠରୀକୁ ଟାଣି ନିଆଯାଏ।
ତେଣୁ, ଏକ କୁଲରରେ, ଏହା କେବଳ ପାଣି ନୁହେଁ, ବରଂ ପାଣି, ବାୟୁ, ବାଷ୍ପୀଭବନ ଏବଂ ଏକ ଫ୍ୟାନ ଯାହା ମିଶି ଥଣ୍ଡା ବାୟୁ ସୃଷ୍ଟି କରେ।
ଶୁଷ୍କ ଗ୍ରୀଷ୍ମରେ କୁଲରଗୁଡ଼ିକ କାହିଁକି ଭଲ କାମ କରନ୍ତି?
କୁଲରଗୁଡ଼ିକ ସେହି ଅଞ୍ଚଳରେ ଭଲ କାମ କରେ ଯେଉଁଠାରେ ବାୟୁ ଶୁଷ୍କ ଥାଏ।
ଉଦାହରଣ ସ୍ୱରୂପ, ଦିଲ୍ଲୀ, ରାଜସ୍ଥାନ, ହରିୟାଣା ଏବଂ ଉତ୍ତର ପ୍ରଦେଶର ଅନେକ ଅଞ୍ଚଳରେ, ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଋତୁରେ ବାୟୁ ବହୁତ ଶୁଷ୍କ ଥାଏ। ଶୁଷ୍କ ପବନରେ ପାଣି ଶୀଘ୍ର ବାଷ୍ପୀଭୂତ ହୁଏ, ତେଣୁ କୁଲରଗୁଡ଼ିକ ଥଣ୍ଡା ପବନ ପ୍ରଦାନ କରେ।
ତଥାପି, ଯେଉଁଠାରେ ବାୟୁରେ ପୂର୍ବରୁ ବହୁତ ଆର୍ଦ୍ରତା ଥାଏ, ଯେପରିକି ସମୁଦ୍ର ନିକଟବର୍ତ୍ତୀ ଅଞ୍ଚଳ କିମ୍ବା ବର୍ଷା ଋତୁରେ, ପାଣି କମ୍ ଶୀଘ୍ର ବାଷ୍ପୀଭୂତ ହୁଏ। ତେଣୁ, କୁଲରର ଥଣ୍ଡା କ୍ଷମତା ହ୍ରାସ ପାଏ।
ବର୍ଷା ଋତୁରେ କାହିଁକି ଏକ କୁଲର କମ୍ ଥଣ୍ଡା ପ୍ରଦାନ କରେ?
ବର୍ଷା ଋତୁରେ, ବାୟୁ ବହୁତ ଆର୍ଦ୍ର ଥାଏ। ଯେତେବେଳେ ବାୟୁ ପୂର୍ବରୁ ଆର୍ଦ୍ରତାରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଥାଏ, ଏହା ସହଜରେ ଅଧିକ ଜଳୀୟ ବାଷ୍ପ ଶୋଷଣ କରିପାରେ ନାହିଁ।
ତେଣୁ, କୁଲରର ଓଦା ପ୍ୟାଡରୁ କମ୍ ପାଣି ବାଷ୍ପୀଭୂତ ହୁଏ। ଯେତେବେଳେ ବାଷ୍ପୀଭବନ କମ୍ ଥାଏ, ବାୟୁରୁ କମ୍ ତାପ ନିର୍ଗତ ହୁଏ। ତେଣୁ, ବର୍ଷା ଋତୁରେ, କୁଲରର ବାୟୁ କମ୍ ଥଣ୍ଡା ଏବଂ ଅଧିକ ଚିପ୍ଚିପ୍ ଅନୁଭବ କରେ।
କୁଲର ଏବଂ ଏସି ମଧ୍ୟରେ କ’ଣ ପାର୍ଥକ୍ୟ ଅଛି?
କୁଲର ଏବଂ ଏସି ଉଭୟ ଥଣ୍ଡା ପବନ ପ୍ରଦାନ କରନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ସେମାନଙ୍କର କାର୍ଯ୍ୟ ପଦ୍ଧତି ଭିନ୍ନ।
ଏକ କୁଲର ପାଣିକୁ ବାଷ୍ପୀଭୂତ କରି ବାୟୁକୁ ଥଣ୍ଡା କରିଥାଏ। ଏହା ସାଧାରଣ ପାଣି ଏବଂ ବାହାର ପବନ ବ୍ୟବହାର କରିଥାଏ।
ଏକ AC ଗ୍ୟାସ୍, ଏକ କମ୍ପ୍ରେସର ଏବଂ କଏଲ ବ୍ୟବହାର କରି କୋଠରୀରୁ ତାପ ଦୂର କରିଥାଏ। ଏହା ବାରମ୍ବାର ବାୟୁକୁ ଥଣ୍ଡା କରିଥାଏ ଏବଂ ଆର୍ଦ୍ରତା ହ୍ରାସ କରିଥାଏ।
ତେଣୁ, ଏକ AC ଆର୍ଦ୍ର ପାଗରେ ମଧ୍ୟ ଭଲ କାମ କରେ, କିନ୍ତୁ ଆର୍ଦ୍ର ପାଗରେ ଏକ କୁଲର କମ୍ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ।
କୁଲର ଚଲାଇବା ସମୟରେ ଝରକା ଖୋଲିବା କାହିଁକି ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ?
କୁଲର ଠିକ୍ ଭାବରେ ଚାଲିବା ପାଇଁ, କୋଠରୀରେ ଏକ ଭେଣ୍ଟ ରହିବା ଆବଶ୍ୟକ।
କୁଲର ବାହାର ପବନକୁ ଟାଣି ଭିତରକୁ ବାଧ୍ୟ କରେ ଏବଂ ଏହାକୁ ଭିତରକୁ ବାଧ୍ୟ କରେ। ଯଦି କୋଠରୀରେ କୌଣସି ଭେଣ୍ଟ ନଥାଏ, ତେବେ ଆର୍ଦ୍ରତା ବୃଦ୍ଧି ପାଇବ, କୁଲରର ଥଣ୍ଡା କ୍ଷମତା ହ୍ରାସ କରିବ।
ତେଣୁ, କୁଲର ଚଲାଇବା ସମୟରେ ଏକ ଝରକା କିମ୍ବା ଦ୍ୱାର ଟିକେ ଖୋଲା ରଖିବା ଉଚିତ। ଏହା ପୁରୁଣା, ଗରମ ଏବଂ ଆର୍ଦ୍ର ପବନ ବାହାରକୁ ବାହାରି ପାରିବ ଏବଂ ତାଜା ପବନ ପ୍ରବେଶ କରିପାରିବ।
କୁଲରର ଥଣ୍ଡା କ୍ଷମତା ବୃଦ୍ଧି କରିବା ପାଇଁ କ'ଣ କରିବେ?
କୁଲରର ଥଣ୍ଡା କ୍ଷମତା ବୃଦ୍ଧି କରିବା ପାଇଁ କିଛି ସରଳ କଥା ମନେ ରଖିବାକୁ ହେବ।
କୁଲରରେ ସଫା ପାଣି ରଖନ୍ତୁ। ମଇଳା ପାଣି ପ୍ୟାଡକୁ କ୍ଷତି ପହଞ୍ଚାଇପାରେ ଏବଂ ଦୁର୍ଗନ୍ଧ ସୃଷ୍ଟି କରିପାରେ।
ସମୟ ସମୟରେ ପ୍ୟାଡ୍ ସଫା କରନ୍ତୁ। ଯଦି ପ୍ୟାଡ୍ ଉପରେ ଧୂଳି, ମଇଳା କିମ୍ବା ଲୁଣ ଜମା ହୁଏ, ତେବେ ଏହା ବାୟୁ ପ୍ରବାହକୁ ଅବରୋଧ କରେ, ଯାହା ଥଣ୍ଡାକୁ ହ୍ରାସ କରେ।
କୁଲରକୁ ଏପରି ସ୍ଥାନରେ ରଖନ୍ତୁ ଯେଉଁଠାରେ ଏହା ତାଜା ପବନ ଗ୍ରହଣ କରେ। କୁଲରକୁ ଏକ ବନ୍ଦ କୋଠରୀ ଭିତରେ ରଖିବା ଦ୍ୱାରା ଏହାର ପ୍ରଭାବ ହ୍ରାସ ପାଏ।
କୋଠରୀରେ ବାୟୁଚଳନ ବଜାୟ ରହିବାକୁ ନିଶ୍ଚିତ କରନ୍ତୁ। ଏହା ଆର୍ଦ୍ରତା ଜମା ହେବାରୁ ରୋକିଥାଏ ଏବଂ କୁଲର ଭଲ ଭାବରେ କାମ କରେ।
ମୂଳ କଥା:
କୁଲରରେ ପାଣି ମିଶାଇ ଥଣ୍ଡା ବାୟୁ ଉତ୍ପାଦନ କରାଯାଏ କାରଣ ପାଣି ବାଷ୍ପ ଗଠନ ପାଇଁ ବାଷ୍ପରୁ ତାପ ଶୋଷଣ କରେ। ଯେତେବେଳେ ଗରମ ବାୟୁ ଓଦା ପ୍ୟାଡ୍ ଉପରେ ଯାଏ, କିଛି ପାଣି ବାଷ୍ପୀଭୂତ ହୁଏ। ଏହି ବାଷ୍ପୀଭବନ ବାୟୁର ଉତ୍ତାପକୁ ବ୍ୟବହାର କରେ, ବାୟୁକୁ ଥଣ୍ଡା କରେ।
ଏହି ଥଣ୍ଡା ବାୟୁକୁ ଫ୍ୟାନ୍ ସାହାଯ୍ୟରେ ବାହାର କରିଦିଆଯାଏ, ଯାହା ଆମକୁ ଥଣ୍ଡାତାର ଅନୁଭବ ପ୍ରଦାନ କରେ।
कूलर में पानी डालने से ठंडी हवा क्यों आती है?
गर्मी के मौसम में जब हम कूलर चलाते हैं और उसमें पानी डालते हैं, तो कुछ ही देर में कूलर से ठंडी हवा आने लगती है। बहुत लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर सिर्फ पानी डालने से हवा ठंडी कैसे हो जाती है? क्या कूलर के अंदर कोई AC जैसी गैस होती है? या पानी अपने आप हवा को ठंडा कर देता है?
इसका जवाब बहुत आसान है। कूलर पानी के वाष्पीकरण के सिद्धांत पर काम करता है।
कूलर का मुख्य सिद्धांत: वाष्पीकरण
जब पानी गर्मी लेकर भाप में बदलता है, तो उसे वाष्पीकरण कहते हैं।
आसान भाषा में समझें तो जब पानी हवा के संपर्क में आता है, तो उसका कुछ हिस्सा धीरे-धीरे भाप बनकर उड़ने लगता है। भाप बनने के लिए पानी को ऊर्जा यानी गर्मी चाहिए होती है। यह गर्मी वह आसपास की हवा से खींच लेता है।
जब पानी हवा से गर्मी खींच लेता है, तो हवा का तापमान कम हो जाता है। इसी वजह से कूलर से आने वाली हवा हमें ठंडी महसूस होती है।
कूलर के अंदर क्या होता है?
कूलर के अंदर कुछ मुख्य चीजें होती हैं:
1. पानी की टंकी
2. पंप
3. घास या हनीकॉम्ब पैड
4. पंखा या ब्लोअर
5. हवा आने और जाने का रास्ता
जब हम कूलर में पानी भरते हैं, तो नीचे की टंकी में पानी जमा हो जाता है। कूलर का पंप इस पानी को ऊपर तक पहुंचाता है और पानी को घास वाले पैड या हनीकॉम्ब पैड पर फैलाता है।
अब ये पैड पानी से गीले हो जाते हैं। जब बाहर की गर्म हवा इन गीले पैड से होकर गुजरती है, तो पानी का कुछ हिस्सा भाप बनकर उड़ता है। इस प्रक्रिया में पानी हवा की गर्मी सोख लेता है। नतीजा यह होता है कि गर्म हवा ठंडी होकर पंखे की मदद से कमरे में आती है।
उदाहरण से समझिए
मान लीजिए आपने अपने हाथ पर थोड़ा पानी लगाया। कुछ देर बाद जब हवा चलती है, तो हाथ ठंडा महसूस होता है।
क्यों?
क्योंकि हाथ पर लगा पानी भाप बनकर उड़ता है। भाप बनने के लिए वह आपके हाथ की गर्मी लेता है। इसलिए हाथ ठंडा महसूस होता है।
कूलर में भी यही होता है। फर्क बस इतना है कि कूलर यह काम बड़े स्तर पर करता है।
कूलर में घास या हनीकॉम्ब पैड का काम
कूलर के पैड का काम सिर्फ पानी को रोकना नहीं होता, बल्कि पानी को ज्यादा सतह पर फैलाना होता है।
जब पानी ज्यादा सतह पर फैलता है, तो हवा का संपर्क पानी से ज्यादा होता है। इससे वाष्पीकरण ज्यादा होता है और हवा ज्यादा ठंडी होती है।
पुराने कूलर में घास के पैड लगाए जाते थे। आजकल कई कूलर में हनीकॉम्ब पैड लगाए जाते हैं। हनीकॉम्ब पैड पानी को ज्यादा देर तक रोकते हैं और हवा को अच्छे से गुजरने देते हैं, इसलिए कई बार वे ज्यादा असरदार माने जाते हैं।
पंखे का काम क्या है?
कूलर में लगा पंखा बाहर की गर्म हवा को खींचता है और उसे गीले पैड से गुजारता है।
जैसे ही हवा गीले पैड से गुजरती है, पानी वाष्पित होता है और हवा की गर्मी कम हो जाती है। फिर यही ठंडी हवा कमरे में आती है।
इसलिए कूलर में सिर्फ पानी नहीं, बल्कि पानी + हवा + वाष्पीकरण + पंखा मिलकर ठंडी हवा बनाते हैं।
कूलर सूखी गर्मी में ज्यादा अच्छा क्यों चलता है?
कूलर सबसे अच्छा उन जगहों पर चलता है जहां हवा सूखी होती है।
जैसे दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में गर्मी के समय हवा काफी सूखी होती है। सूखी हवा में पानी जल्दी भाप बनता है, इसलिए कूलर ज्यादा ठंडी हवा देता है।
लेकिन जहां हवा में पहले से ही बहुत नमी होती है, जैसे समुद्र के पास वाले इलाके या बरसात के मौसम में, वहां पानी जल्दी भाप नहीं बन पाता। इसलिए कूलर की ठंडक कम हो जाती है।
बरसात में कूलर कम ठंडा क्यों करता है?
बरसात के मौसम में हवा में नमी बहुत ज्यादा होती है। जब हवा पहले से ही नमी से भरी होती है, तो वह और ज्यादा पानी की भाप आसानी से नहीं ले पाती।
इसलिए कूलर के गीले पैड से पानी कम वाष्पित होता है। जब वाष्पीकरण कम होगा, तो हवा से गर्मी भी कम निकलेगी। इसलिए बरसात में कूलर की हवा ठंडी कम और चिपचिपी ज्यादा लगती है।
कूलर और AC में क्या अंतर है?
कूलर और AC दोनों ठंडी हवा देते हैं, लेकिन दोनों का तरीका अलग है।
कूलर पानी के वाष्पीकरण से हवा ठंडी करता है। इसमें सामान्य पानी और बाहर की हवा का इस्तेमाल होता है।
AC गैस, कंप्रेसर और कॉइल की मदद से कमरे की गर्मी को बाहर निकालता है। AC कमरे की हवा को बार-बार ठंडा करता है और नमी भी कम करता है।
इसलिए AC नमी वाले मौसम में भी अच्छा काम करता है, लेकिन कूलर नमी वाले मौसम में उतना असरदार नहीं रहता।
कूलर चलाते समय खिड़की खोलना क्यों जरूरी है?
कूलर को सही तरीके से चलाने के लिए कमरे में हवा का रास्ता होना चाहिए।
कूलर बाहर की हवा को खींचकर अंदर भेजता है। अगर कमरे में बाहर निकलने का रास्ता नहीं होगा, तो अंदर नमी बढ़ती जाएगी और कूलर की ठंडक कम हो जाएगी।
इसलिए कूलर चलाते समय एक खिड़की या दरवाजा थोड़ा खुला रखना चाहिए। इससे पुरानी गर्म और नम हवा बाहर निकलती रहती है और नई हवा अंदर आती रहती है।
कूलर की ठंडक बढ़ाने के लिए क्या करें?
कूलर की ठंडक बढ़ाने के लिए कुछ आसान बातें ध्यान रखनी चाहिए।
कूलर में साफ पानी रखें। गंदा पानी पैड को खराब कर सकता है और बदबू भी पैदा कर सकता है।
पैड को समय-समय पर साफ करें। अगर पैड में धूल, मिट्टी या नमक जम जाए, तो हवा का रास्ता रुक जाता है और ठंडक कम हो जाती है।
कूलर को ऐसी जगह रखें जहां से उसे ताजी हवा मिले। बंद कमरे के अंदर कूलर रखने से उसका असर कम हो जाता है।
कमरे में हवा निकलने का रास्ता रखें। इससे नमी जमा नहीं होती और कूलर बेहतर काम करता है।
आसान भाषा में पूरा निष्कर्ष
कूलर में पानी डालने से ठंडी हवा इसलिए आती है क्योंकि पानी भाप बनने के लिए हवा से गर्मी खींच लेता है। जब गर्म हवा गीले पैड से होकर गुजरती है, तो पानी का कुछ हिस्सा वाष्पित होता है। इस वाष्पीकरण में हवा की गर्मी खर्च हो जाती है और हवा ठंडी हो जाती है।
यही ठंडी हवा पंखे की मदद से बाहर निकलती है और हमें ठंडक महसूस होती है।
कूलर का असली विज्ञान यही है:
गर्म हवा + गीले पैड + वाष्पीकरण = ठंडी हवा


